
हँसो अपने पर न हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहटपकड़ ली जाएगी और तुम मारे जाओगेऐसे हँसो कि बहुत खुश न मालूम होवरना शक होगा कि यह शख्स शर्म में शामिल नहींऔर मारे जाओगे
हँसते हँसते किसी को जानने मत दो किस पर हँसते होसब को मानने दो कि तुम सब की तरह परास्त होकरएक अपनापे की हँसी हँसते होजैसे सब हँसते हैं बोलने के बजाए
जितनी देर ऊँचा गोल गुंबद गूंजता रहे, उतनी देरतुम बोल सकते हो अपने सेगूंज थमते थमते फिर हँसनाक्योंकि तुम चुप मिले तो प्रतिवाद के जुर्म में फंसेअन्त में हँसे तो तुम पर सब हँसेंगे और तुम बच जाओगे
हँसो पर चुटकुलों से बचोउनमें शब्द हैंकहीँ उनमें अर्थ न हों जो किसी ने सौ साल पहले दिए हों
बेहतर है कि जब कोई बात करो तब हँसोताकि किसी बात का कोई मतलब न रहेऔर ऐसे मौकों पर हँसोजो कि अनिवार्य होंजैसे गरीब पर किसी ताकतवर की मारजहाँ कोई कुछ कर नहीं सकताउस गरीब के सिवाय और वह भी अकसर हँसता है
हँसो हँसो जल्दी हँसोइसके पहले कि वह चले जाएँउनसे हाथ मिलाते हुएनजरें नीची किए उसको याद दिलाते हुए हँसोकि तुम कल भी हँसे थे.
4 टिप्पणियां:
यह तो पहले भी कहीं पढ़ा हुआ है ;)
यह सही काम नहीं.
राघुवीर सहाय की इस कविता को बिना क्रेडिट दिए चुराकर ऐडक्लिक की उम्मीद- हमें नागवार गुजर रही है।
http://rachanakar.blogspot.com/2006/09/blog-post.html से चुराकर ! यह सही काम नहीं है।
किसी की अनुमति लिए बिना तथा उसे क्रेडिट दिए बिना उसकी सामग्री छापना अनुचित कार्य है। कॄपया लेखक का नाम दें तथा साथ में "रचनाकार से साभार" लिखें।
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